RawPods: Creative Thought & Expression (Poetry | Literature | Thought)
Aug 12, 2026 · 19 min · 8 segments
Safar Episode 2: Chashma-e-Rawaan, The Founding Streams - A RawaPods series by Rawanee *The journey a voice takes across languages, migrations, and inheritances. Daniele, Qudsia, Laiba, Samar, Omer…
हम देखेंगे। हम देखेंगे। लाजिम है के हम भी देखेंगे। हम देखेंगे। वो दिन के जिसका वादा है हम देखेंगे। जो लोहे अज़ल पे लिखा है हम देखेंगे। जब जुल्मो सितम के कोहे गरा। जब जुल्मो सितम के कोहे गरा। रुई की तरह उड़ जाएंगे। हम महकूमो के पाऊँ तले। ये धरती धड़ धड़ धड़केगी। और अहले हुकम के सहरों ख़्बर जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी हम देखेंगे। हम देखेंगे। लाजिम है के हम भी देखेंगे। हम देखेंगे।
अ, वो फसाना ख़त्म हुआ मिलके तुमसे। वो फसाना ख़त्म हुआ मिलके तुमसे। राज़ सारे कह दिए दिल के तुमसे। लबे फरात लश्कर का क्या हाल सुनोगे तुम? पानी न पिया जाए है हिलके तुमसे। मेरी रिदाए ग़म का हर तार खुल गया। मेरी रिदाए ग़म का हर तार खुल गया। मेरा ज़ख्म बेहिजाब हुआ सिलके तुमसे। खेती उगी तो कचरे के ढेर बन गए। खेती उगी तो कचरे के ढेर बन गए। संभाले ना गए ये छिलके तुमसे। अपनी कोहताक़ कभी पे रोना आया। अपनी कोहताक़ कभी पे रोना आया। हैं लोभ अब मेरे मुक़ाबिल के तुमसे। बर्बाद हुआ देस मगर फिर भी मस्त हैं। बर्बाद हुआ देस मगर फिर भी हैं मस्त। क्या हाल कहूं कूचै जाहिल के तुमसे। तुमके मयारे हुस्न-ओ-खुदाराई हो। तुमके मयारे हुस्, हुस्न-ओ-खुदाराई हो। दाद चाहें फूल भी खिल के तुमसे। तुम बनते हो मसीहा मगर अफसोस। तुम बनते हो मसीहा मगर अफसोस। सिल ना सके ज़ख्म मेरे दिल के तुमसे। तुम लाख मेरे क़त्ल का इल्ज़ाम ना लो। तुम लाख मेरे क़त्ल का इल्ज़ाम ना लो। अंदाज़ सभी हैं क़ातिल के तुमसे।
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हम देखेंगे। हम देखेंगे। लाजिम है के हम भी देखेंगे। हम देखेंगे। वो दिन के जिसका वादा है हम देखेंगे। जो लोहे अज़ल पे लिखा है हम देखेंगे। जब जुल्मो सितम के कोहे गरा। जब जुल्मो सितम के कोहे गरा। रुई की तरह उड़ जाएंगे। हम महकूमो के पाऊँ तले। ये धरती धड़ धड़ धड़केगी। और अहले हुकम के सहरों ख़्बर जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी हम देखेंगे। हम देखेंगे। लाजिम है के हम भी देखेंगे। हम देखेंगे।
अ, वो फसाना ख़त्म हुआ मिलके तुमसे। वो फसाना ख़त्म हुआ मिलके तुमसे। राज़ सारे कह दिए दिल के तुमसे। लबे फरात लश्कर का क्या हाल सुनोगे तुम? पानी न पिया जाए है हिलके तुमसे। मेरी रिदाए ग़म का हर तार खुल गया। मेरी रिदाए ग़म का हर तार खुल गया। मेरा ज़ख्म बेहिजाब हुआ सिलके तुमसे। खेती उगी तो कचरे के ढेर बन गए। खेती उगी तो कचरे के ढेर बन गए। संभाले ना गए ये छिलके तुमसे। अपनी कोहताक़ कभी पे रोना आया। अपनी कोहताक़ कभी पे रोना आया। हैं लोभ अब मेरे मुक़ाबिल के तुमसे। बर्बाद हुआ देस मगर फिर भी मस्त हैं। बर्बाद हुआ देस मगर फिर भी हैं मस्त। क्या हाल कहूं कूचै जाहिल के तुमसे। तुमके मयारे हुस्न-ओ-खुदाराई हो। तुमके मयारे हुस्, हुस्न-ओ-खुदाराई हो। दाद चाहें फूल भी खिल के तुमसे। तुम बनते हो मसीहा मगर अफसोस। तुम बनते हो मसीहा मगर अफसोस। सिल ना सके ज़ख्म मेरे दिल के तुमसे। तुम लाख मेरे क़त्ल का इल्ज़ाम ना लो। तुम लाख मेरे क़त्ल का इल्ज़ाम ना लो। अंदाज़ सभी हैं क़ातिल के तुमसे।