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Siddharth Sawan

Siddharth Sawan

Jun 7, 2026

51:57
सिद्धान्त। ओए नहीं। सिद्धार्थ सावन, सावन सावन।
52:06
This is a little sensitive so trigger warning because I was going to do a love piece। But then Priya ma'am said कि अपनी अपनी सच्चाई कहो तो this is this is what I write this is what I love to write। मेरा आवाज़ आ रहा है।
52:18
हां हां बिल्कुल आ रहा है।
52:19
ठीक है। जो सोचा ना किसी ने मैं सितम वो करने जाऊंगा। जो सोचा ना किसी ने मैं सितम वो करने जाऊंगा। मैं अपनी प्यास को खुद ही बुझाने पानी लाऊंगा। वो पानी ऐसा वैसा ना मगर होगा जमी का जो कि जिस पर चलते हैं मजदूर। जिस पर रेत काफी है। मैं उसकी कीचड़ से पानी खींचकर सबको दिखाऊंगा। मैं अपनी प्यास को खुद ही बुझाने पानी लाऊंगा। मुझे कुछ बात confusion सभी के मुंह पर दिखती है। मैं जब भी कहता हूं यह बात मुझे आंखें परखती है। मैंने कीचड़ से ही क्यों पानी को पीने का सोचा है। जमाने में कई हैं नल मैंने क्यों ऐसा सोचा है। मैं तुमको यह तो बतला दूं कि कीचड़ क्या बदलता है कि मिट्टी, रेत, पानी से वो पीने लायक बनता है। मैं पहले उसको एक कपड़े में रख के यूं निचोड़ूंगा कि मिट्टी, रेत, पानी एक तरफ पानी निचोड़ूंगा। वो पानी गंधला गंधला दिखता है पर पीना तो होगा। किन उसके आजमाकर पानी मुझको यूं बदलना है। वो गंधला पानी में एक गिलास में भर के यूं रख दूंगा। कपड़ा उसमें डाले छोर उसका गिलास में होगा कि दूजा छोर दूजे गिलास में हो जो होनी चाहिए कि जमीन खींचे वो पानी कपड़े से और साफ हो जाए। समझता हूं सिर्फ बातों से समझना मुमकिन ना है पर हमें तो ऐसा ही करना है पड़ता प्यास की खातिर। वो क्या है हम जहां रहते हैं उसको गाजा सब कहते। मेरे जैसे बहुत हैं जो कि अब भी जमी रहते। हमें तो पानी भी कीचड़ से मिलता है उधारी पर हमें तो सांस भी मिलती है उनसे अब उधारी पर हमारा जीना मरना दफना होना बस उधारी का। हमारी जिंदगी है खेल या है यह मदारी का। कहते हैं कहानी लिखता है जो अंत में बचते। कहानी मेरे मुझैस हो के फिर तो कौन लिखेगा। कहानी मेरे मुझैस हो के फिर तो कौन लिखेगा। बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

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