
Siddharth Sawan
1
APPEARANCES
1
PODCASTS
012
DEC 30
JAN 6
JAN 13
JAN 20
JAN 27
FEB 3
FEB 10
FEB 17
FEB 24
MAR 3
MAR 10
MAR 17
MAR 24
MAR 31
APR 7
APR 14
APR 21
APR 28
MAY 5
MAY 12
MAY 19
MAY 26
JUN 2
JUN 9
JUN 16
JUN 23
JUN 30
JUL 7
JUL 14
JUL 21
JUL 28
AUG 4
AUG 11
AUG 18
AUG 25
SEP 1
SEP 8
SEP 15
SEP 22
SEP 29
OCT 6
OCT 13
OCT 20
OCT 27
NOV 3
NOV 10
NOV 17
NOV 24
DEC 1
DEC 8
DEC 15
DEC 22
DEC 29
JAN 5
JAN 12
JAN 19
JAN 26
FEB 2
FEB 9
FEB 16
FEB 23
MAR 2
MAR 9
MAR 16
MAR 23
MAR 30
APR 6
APR 13
APR 20
APR 27
MAY 4
MAY 11
MAY 18
MAY 25
JUN 1
JUN 8
JUN 15
JUN 22
JUN 29
JUL 6
JUL 13
JUL 20
JUL 27
AUG 3
AUG 10
AUG 17
AUG 24
AUG 31
SEP 7
SEP 14
SEP 21
SEP 28
OCT 5
Jun 7, 2026
Spoken Word & Storytelling: Where Words Come Alive | ft. Roshan Abbas, Priya Malik & Yahya Bootwala
52:06
52:19

Siddharth SawanGUEST
This is a little sensitive so trigger warning because I was going to do a love piece। But then Priya ma'am said कि अपनी अपनी सच्चाई कहो तो this is this is what I write this is what I love to write। मेरा आवाज़ आ रहा है।

Siddharth SawanGUEST
ठीक है। जो सोचा ना किसी ने मैं सितम वो करने जाऊंगा। जो सोचा ना किसी ने मैं सितम वो करने जाऊंगा। मैं अपनी प्यास को खुद ही बुझाने पानी लाऊंगा। वो पानी ऐसा वैसा ना मगर होगा जमी का जो कि जिस पर चलते हैं मजदूर। जिस पर रेत काफी है। मैं उसकी कीचड़ से पानी खींचकर सबको दिखाऊंगा। मैं अपनी प्यास को खुद ही बुझाने पानी लाऊंगा। मुझे कुछ बात confusion सभी के मुंह पर दिखती है। मैं जब भी कहता हूं यह बात मुझे आंखें परखती है। मैंने कीचड़ से ही क्यों पानी को पीने का सोचा है। जमाने में कई हैं नल मैंने क्यों ऐसा सोचा है। मैं तुमको यह तो बतला दूं कि कीचड़ क्या बदलता है कि मिट्टी, रेत, पानी से वो पीने लायक बनता है। मैं पहले उसको एक कपड़े में रख के यूं निचोड़ूंगा कि मिट्टी, रेत, पानी एक तरफ पानी निचोड़ूंगा। वो पानी गंधला गंधला दिखता है पर पीना तो होगा। किन उसके आजमाकर पानी मुझको यूं बदलना है। वो गंधला पानी में एक गिलास में भर के यूं रख दूंगा। कपड़ा उसमें डाले छोर उसका गिलास में होगा कि दूजा छोर दूजे गिलास में हो जो होनी चाहिए कि जमीन खींचे वो पानी कपड़े से और साफ हो जाए। समझता हूं सिर्फ बातों से समझना मुमकिन ना है पर हमें तो ऐसा ही करना है पड़ता प्यास की खातिर। वो क्या है हम जहां रहते हैं उसको गाजा सब कहते। मेरे जैसे बहुत हैं जो कि अब भी जमी रहते। हमें तो पानी भी कीचड़ से मिलता है उधारी पर हमें तो सांस भी मिलती है उनसे अब उधारी पर हमारा जीना मरना दफना होना बस उधारी का। हमारी जिंदगी है खेल या है यह मदारी का। कहते हैं कहानी लिखता है जो अंत में बचते। कहानी मेरे मुझैस हो के फिर तो कौन लिखेगा। कहानी मेरे मुझैस हो के फिर तो कौन लिखेगा। बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
