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Ashish Manshanda

Jun 7, 2026

49:36
आशीष मनशंदा।
49:43
So this is a series that I write और इसकी mostly poem start होती है with याद है। It's like a string of memories तो I will just start। याद है अनंतकाल के बीस मिनट बाद आदिकाल की वो आदि थी जब मैं तुम्हें विष्णु की नाभि में ढूंढ रहा था। तुमने अपने बारे में एक दुनिया बनाई थी जहां फूंक मारकर भंवर बना देती हो। जहां घूंठ मारकर झरने बुझा देती हो। कानों से उतार कर रोशनी के बुलबुले कभी जमीन पर गिरा देती हो, कभी आसमान पर बिछा देती हो। पलकों से कभी जो नीर निकलता है, आंखों से निरंतर एक नूर निकलता है। तेरी ऐनक के शीशे से छनकर आसमान की खलाओं में एक धनक सा बनता है। चांद ने जब तुमसे थोड़ा सा अंधेरा उधार लिया था। आंखों की कोरों पर तुमने आंखों की कोरों से तुमने काजल उतार लिया था। अपनी छोटी उंगली के सिरे पर तुमने रात की तकलीफ की थी। एक जिद्दी से चांद की खातिर कितनी तकलीफ ली थी। और वह बूढ़ा सैयारा जो अपनी चूड़ियां तुम्हारे पास गिरवी रख गया है। मना किया था चांद ने उसके फिर भी रख गया है। कहते हैं एक वक्त पर उसको भी कोई कमी कहां थी। होगा कोई बुरा वक्त या साढ़े साती। और यह जो नाखून तराशकर बुरादा उड़ा देती हो। हवाओं में आंख के अंधे रेते लिए तूफान आ जाते हैं। सहराओं में। एक नूर का झरना आंखों से कुछ पिघला कुंदन। होंठों से तेरी गर्दन परा मिलता है तेरी गर्दन जहां पर देव प्रयाग का संगम निकलता है वहीं से मैं कुछ त्रिवेणी उठा लाता हूं। एक तेरे छूने भर से मैं शायर बन जाता हूं। तेरा नाम महज एक बार लेने से मैं बुद्ध हो गया हूं। मैं तुम हो गया हूं। मैं शुद्ध हो गया हूं। मैं खुद हो गया हूं। यह जो तुझसे तेरी यह दुनिया है। यह जो मुझसे बड़ी दुनिया है। मैं जानता हूं इसमें थोड़ा वक्त लगेगा तुम्हें। मैं तुम्हें वहीं मिलूंगा। अनंतकाल के 20 मिनट बाद आदिकाल की उस आदिति के समय।

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