श्री रामचरितमानस (All India Radio @1990)
Sep 22, 2026 · 9 min · 1 segments
Hey! I'd love to hear your thoughts, send me a voice note. Praising the specific virtues of Lord Ram and the liberating nature of His pastimes.
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श्री राम के नाम की महिमा अपरंपार है। नाम के प्रसाद से ही शंभू अविनाशी हैं और अमंगल वेषधारी होकर भी मंगलकारी हैं। नारद मुनि ने नाम की महिमा को जाना और हरि तथा हर दोनों के प्रिय हो गए। विमाता के दुर्व्यवहार से दुखी होकर ध्रुव ने प्रभु का नाम जपा और ध्रुव लोक प्राप्त किया। राम के नाम स्मरण से ही हनुमान ने आराध्य को अपने वश में करके उनकी कृपा प्राप्त की। कलियुग में प्रभु के नाम को कल्पतरु अर्थात् मनचाहा फलदाई बताया गया है। इसी नाम का स्मरण करके गोस्वामी तुलसीदास ने तुलसी की पवित्रता प्राप्त की। नाम की महिमा गाकर जीव चारों युगों, तीनों काल तथा तीनों लोकों में शोक से मुक्ति पा जाते हैं। वेद, पुराण तथा संतों ने नाम की ही महिमा गाई है। कहते हैं सतयुग में ध्यान, त्रेता में यश तथा द्वापर में पूजा अर्चना से प्रभु प्रसन्न होते हैं। किंतु कलियुग में मनुष्य मन पापरूपी समुद्र की मछली के समान है। इस कारण वह ध्यान, यज्ञ अथवा पूजा अर्चना संपन्न नहीं कर पाता। अतः कर्म, भक्ति तथा ज्ञान के अभाव में नाम स्मरण ही एकमात्र आधार है। [background music] नाम प्रसाद शंभू अविनाशी। साजु अमंगल मंगल राशी। सुख सन कागी सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्म सुख भोगी। नारद जानेरु नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आबू। नाम जपत प्रभु कीन्ह प्रसाद। भगत सिरोमनि भे प्रहलाद। ध्रुव सकलानि जपेउ हरि नाम। पायउ अचल अनुपम थाम। सुमिरि पवनसुत पावन नाम। अपने बस करि राखे राम। अपतु अजामिल गजुगनि काउ। भयमु कुतु हरि नाम प्रभाव। कहौं कहा लगि नाम बड़ाई। राम न सकहिं नाम गुन गाई। [background music] नाम राम को कल्पतरु। कलि कल्याण निवास। जो सुमिरत भयउ भागती। तुलसी, तुलसीदास। [background music] चहुँ जुग तीनि काल तिहुं लोक। भय नाम जपि जीव बिसोक। वेद पुराण संत मत एउ। सकल सुकृत फल राम सनेहु। ज्ञान प्रथम जुग मख बिधि दूजे। द्वापर परितोषत प्रभु पूजे। कलि केवल मल मूल मलिना। पाप पयोनिधि जनु मन मीना। नाम काम तरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला। राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता। नहीं कलि कर्म न भक्ति विवेक। राम नाम अवलंबन एक। काल नेमि कलि कपट निधानु। नाम सुमति समरथ हनुमानु। [background music] राम नाम नर केसरी। कनक कसि कुकली काल। जापक जन प्रहलाद जिमी पाली दली सुर साल। भाई कुभाई अनक आलस हूं। नाम जपत मंगल दिसि दस हूं। सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा करउँ नाइ रघुनाथ ही माथा। मोरि सुधारी सो सब भाँति जासु कृपा नहिं कृपा अघाती। राम सुस्वामी सुसेवक मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो। लो कहुँ वेद मुसाहिब प्रीति बिनय सुनत पहचानत प्रीति। गनि गरीब ग्राम नर नाग पंडित मूढ़ मलिन उजागर। सुकभी कुकभी निज मत अनुहारी नृपहिं सराहत सब नर नारी। साधु सुजान सुशील नृपाला इस अंश भव परम कृपाला। सुनि सनमानहिं सबहिं सुबानी भनति भगति नति गति पहि जानी। यह प्राकृत महिपाल सुभाउ जान सिरोमनि को सल राऊ। श्रीझट राम सनेहनि सोते को जग मंद मलिन मति मोटे।
श्री राम के नाम की महिमा अपरंपार है। नाम के प्रसाद से ही शंभू अविनाशी हैं और अमंगल वेषधारी होकर भी मंगलकारी हैं। नारद मुनि ने नाम की महिमा को जाना और हरि तथा हर दोनों के प्रिय हो गए। विमाता के दुर्व्यवहार से दुखी होकर ध्रुव ने प्रभु का नाम जपा और ध्रुव लोक प्राप्त किया। राम के नाम स्मरण से ही हनुमान ने आराध्य को अपने वश में करके उनकी कृपा प्राप्त की। कलियुग में प्रभु के नाम को कल्पतरु अर्थात् मनचाहा फलदाई बताया गया है। इसी नाम का स्मरण करके गोस्वामी तुलसीदास ने तुलसी की पवित्रता प्राप्त की। नाम की महिमा गाकर जीव चारों युगों, तीनों काल तथा तीनों लोकों में शोक से मुक्ति पा जाते हैं। वेद, पुराण तथा संतों ने नाम की ही महिमा गाई है। कहते हैं सतयुग में ध्यान, त्रेता में यश तथा द्वापर में पूजा अर्चना से प्रभु प्रसन्न होते हैं। किंतु कलियुग में मनुष्य मन पापरूपी समुद्र की मछली के समान है। इस कारण वह ध्यान, यज्ञ अथवा पूजा अर्चना संपन्न नहीं कर पाता। अतः कर्म, भक्ति तथा ज्ञान के अभाव में नाम स्मरण ही एकमात्र आधार है। [background music] नाम प्रसाद शंभू अविनाशी। साजु अमंगल मंगल राशी। सुख सन कागी सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्म सुख भोगी। नारद जानेरु नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आबू। नाम जपत प्रभु कीन्ह प्रसाद। भगत सिरोमनि भे प्रहलाद। ध्रुव सकलानि जपेउ हरि नाम। पायउ अचल अनुपम थाम। सुमिरि पवनसुत पावन नाम। अपने बस करि राखे राम। अपतु अजामिल गजुगनि काउ। भयमु कुतु हरि नाम प्रभाव। कहौं कहा लगि नाम बड़ाई। राम न सकहिं नाम गुन गाई। [background music] नाम राम को कल्पतरु। कलि कल्याण निवास। जो सुमिरत भयउ भागती। तुलसी, तुलसीदास। [background music] चहुँ जुग तीनि काल तिहुं लोक। भय नाम जपि जीव बिसोक। वेद पुराण संत मत एउ। सकल सुकृत फल राम सनेहु। ज्ञान प्रथम जुग मख बिधि दूजे। द्वापर परितोषत प्रभु पूजे। कलि केवल मल मूल मलिना। पाप पयोनिधि जनु मन मीना। नाम काम तरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला। राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता। नहीं कलि कर्म न भक्ति विवेक। राम नाम अवलंबन एक। काल नेमि कलि कपट निधानु। नाम सुमति समरथ हनुमानु। [background music] राम नाम नर केसरी। कनक कसि कुकली काल। जापक जन प्रहलाद जिमी पाली दली सुर साल। भाई कुभाई अनक आलस हूं। नाम जपत मंगल दिसि दस हूं। सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा करउँ नाइ रघुनाथ ही माथा। मोरि सुधारी सो सब भाँति जासु कृपा नहिं कृपा अघाती। राम सुस्वामी सुसेवक मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो। लो कहुँ वेद मुसाहिब प्रीति बिनय सुनत पहचानत प्रीति। गनि गरीब ग्राम नर नाग पंडित मूढ़ मलिन उजागर। सुकभी कुकभी निज मत अनुहारी नृपहिं सराहत सब नर नारी। साधु सुजान सुशील नृपाला इस अंश भव परम कृपाला। सुनि सनमानहिं सबहिं सुबानी भनति भगति नति गति पहि जानी। यह प्राकृत महिपाल सुभाउ जान सिरोमनि को सल राऊ। श्रीझट राम सनेहनि सोते को जग मंद मलिन मति मोटे।
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