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Ami Ganatra

Author

Sep 18, 2026

5:23
Hmm.
5:23
And hence, within this cultural milieu, we had so many different gods.
5:29
People believed in different gods and they lived very happily.
5:32
The one thing which sort of binds this entire or sort of binds all the sampradayas, all the darshanas, all the worldviews within this sanatan framework is the karma siddhanta.
5:44
So even while Buddhists and Jains, they may not believe in the authority of the Vedas, but they still believe in the karma siddhanta.
5:52
The karma siddhanta is what you see in your life or what you get dealt with in your life is your responsibility.
6:01
It depends on the karma that you did.

9 MINS LATER

15:25
I want to understand how did our gods evolve? What is the purpose of these gods and deities? And why do we not worship Indra or Agni or Varun like they were mentioned in the Rig Veda and so on? How did this evolution of gods happen to what we currently perceive as gods as well?
15:33
हाँ and since you and since you have done a lot of work there, I'll talk to you। अमी, आपसे, आपसे बात करते हैं। सीताराम गोयल जी ने भी कहा है। संदीप भी कह रहे हैं। हालांकि मैं कि भाई जवाहरलाल नेहरू एक वामपंथी थे, communist थे। वामपंथ, दक्षिणपंथ, Indic, how do you define that, अमी?
15:59
नमस्ते आप सबको। बहुत अच्छा लग रहा है कि जयपुर डायलॉग मैं अपने शहर में attend कर पा रही हूँ और फिर से एक बार जयपुर डायलॉग के मंच पर। [हँसने की आवाज़] बहुत-बहुत आभार जयपुर, जयपुर डायलॉग। संजय जी वापस आती रहेंगी मुंबई। और इस मंच पर book launch करने का भी अवसर मिला तो हृदय दिल से आभार आप सभी का। जो प्रश्न आपने पूछा वामपंथ, Indic wing वगैरह-वगैरह। ये leftism इसकी तो हम परिभाषा करते रहते हैं ना। Leftism क्या है? As संदीप जी very rightly said the question is Indic, Indic question यही है कि India शुरू ही left के लिए independence के बाद होता है। They don't consider it as a civil state, a civilizational state at all.
16:43
This is a negation of the civilization। जबकि आज हम दक्षिणपंथ जो कहते हैं ना right wing this is not a right term here, पर हम जो कहते हैं वो somehow जो Hindutva or nationalism उसके साथ उसका, उसका अर्थ साझा हो गया है। It's like the same thing.
17:00
हम जब right wing कहते हैं तो हम Dharmic wing, Indic wing, Hindutva, nationalism सब उसके साथ आ जाता है beyond what the actual definition would be.
17:09
पर आपका जो overall topic आज का है, उस पे मुझे थोड़ा सा कहना था कि हाँ, हमें लगता है कई बार कि अच्छा आज भी बात होती है कि सरकार हमारी है, system उनका है। हमने 12 वर्ष में कुछ नहीं किया। मुझे लगता है वो थोड़ा सा जो इसके पहले के session में आदि जी कह रहे थे ना। हाय मैं लुट गया, हाय मैं मर गया। I think हमारी वो tendency है because अगर आप उसे बहुत logically देखो तो क्या 12 वर्ष पहले इतने सारे जयपुर डायलॉग के sessions हुए थे जहाँ इतने सारे लोग आए थे? कभी हुआ है 2014 से पहले? और वो अकेला नहीं है।
17:42
तब तक, तब तक संजय दीक्षित जी retire नहीं हुए थे।
17:46
पर, पर और तो बहुत सारे हुए थे ना। बहुत सारे और IRS हुए थे। इतने और even more आज आप आज देखिए, इतने सारे लोग यहाँ पर आए हैं। इतनी सारे YouTube channels हैं जो हमारी बात आगे रख पा रहे हैं। बंगाल फाइल्स, कश्मीर फाइल्स, धुरंधर जैसी movies क्या इससे पहले बन पाती थी? मैं आपको एक बात बताती हूँ। मैं इतिहास की बात करती हूँ। मैंने पिछले तीन चार वर्षों में भारत के top notch universities में महाभारत, रामायण, Indic leadership पर lectures दिए हैं। क्या आप सोच सकते हो? मैं तो नहीं सोच सकती कि ऐसा कभी हो पाया हो। We have come a long way and we should be absolutely proud about it.
18:34
पर आराम से नहीं बैठना है क्योंकि एक बात चाणक्य ने लिखी थी जो मुझे लगता है कि जो हमारे विरोधी हैं वो बहुत अच्छे से समझते हैं कि हमेशा ना कुछ ना कुछ करते रहो जिससे समाज में टूट-फूट होती रहे। वो अभी भी होती है। देखो ऐसा इतने वर्ष हमारी सरकार रही है तो ऐसा तो नहीं होगा कि वो कोई गलतियाँ नहीं करेंगे। अवश्य गलतियाँ करेंगे और हमें उसका विरोध भी करना चाहिए। It is not as if कुछ भी करो चल जाएगा right? पर are we falling into the trap कि हम वापस हमारे समाज के अंदर टूट-फाड़ कर रहे हैं? सही UGC का जो विरोध हुआ वो बहुत सही हुआ। होना ही चाहिए। यहाँ के प्रत्येक जन ने उसका विरोध किया। पर social media पर एक narrative ये भी हो गया actually जात-पात की बातें होने लगी। सवर्ण कुछ-कुछ जो सवर्ण जैसे behave करते थे वो लोग actually जो बाकी लोग हैं हमारे उनको गालियाँ देने लगे। मोदी जी को तेली वेली बोलने लगे right? उसमें तो हमें बचकर रहना ही पड़ेगा। हम उनके fake news आगे बढ़ा रहे हैं जो we know वो जो जुबैर वगैरह जो congressis कर रहे हैं उसमें आगे बढ़ा रहे हैं। तो उस पर तो हमें सावधान होना ही पड़ेगा। और मैं एक last बात कहती हूँ in terms of the progress we've made.
6:47
And the overwhelming love.
6:48
Absolutely.
6:48
So people have appreciated.
6:50
I got a lot of love.
6:52
That's why I got the courage to do this.
6:55
So for that 0.001, I would not write like fuss over it.
6:58
Okay.

6 MINS LATER

12:52
becomes a judge.
6:08
Greetings to
6:09
Neeraj Ji and to all of you and once again Jai Shri Ram to all of you.
6:13
I want to start my talk with an observation which you have just said about Swarva Dharam and Vada Pav.
6:21
So why is it like this? Inherently, we are inclusive.
6:28
Why is that so? You see, in all our homes, we will get this example that there is only one family.
6:34
But one person will pray to Lord Shiva.
6:37
One person will pray to Lord Vishnu.

36 MINS LATER

42:14
So, do you see a contrast in Sanatan Dharma?
27:26
लेकिन उसका मन नहीं था।
27:28
भीष्म पितामह के सामने तो वो कर ही नहीं पा रहा था। जिस प्रकार उसे लड़ना चाहिए भीष्म के सामने और द्रोणाचार्य के सामने, इन दोनों के सामने वो लड़ नहीं पा रहा था। पर भीष्म भी अपनी प्रतिज्ञा पर अटल थे। उन्होंने क्या कहा था दुर्योधन से कि मैं पांडवों को नहीं मारूंगा। परंतु हर रोज मैं 10 हज़ार से भी अधिक सेना जो है पांडवों की, उनका खात्मा करता जाऊंगा और वो, वो कर रहे थे। ठीक है, अब आप सोचिए महारथी सारे हैं, पर सेना मारी जा रही है, सेना मारी जा रही है, सेना मारी जा रही है। तो कृष्ण पहले समझाते हैं अर्जुन को कि भाई तुम क्या कर रहे हो, ये देखो क्या चल रहा है। वो कोई बिल्कुल भी दया नहीं दिखा रहे तुम्हारी सेना पर है ना। तो तुम्हें उनके साथ लड़ना चाहिए। अर्जुन कह रहा है हां केशव मैं लड़ूंगा पर कैसे लड़ूं? वो तो मेरे भीष्म पितामह हैं। मतलब सोचिए अभी तक वो भाव फिर भी है और ठीक है natural है वो attachment तो होता ही होता है। फिर से कृष्ण कह रहे हैं फिर से सामने। फिर बोलेगा नहीं, नहीं मैं लड़ूंगा, लड़ूंगा। फिर से जब भीष्म सामने आएंगे तो ऐसे पूरे जोश से नहीं लड़ेगा। फिर नौवें दिन जब ये बहुत ज्यादा हो गया तब उनका माता, माथा ठनका और जब ये सामने-सामने भीष्म के आगे फिर ये ऐसे नहीं लड़ नहीं रहा था तो वो उतरे। अपना जो-- उसमें पहिया दिखाते हैं but इसमें जो description है उसमें वो उनके हाथ में चाबुक था ना वो लेकर दौड़ते हैं वो भीष्म की ओर। और इसके अर्जुन के लिए तो ये एकदम unexpected है कि ये क्या कर दिया आपने। तो उतरता है और भागता है उनके पीछे और उनके पैर पकड़ लेता है कि आप ऐसे मत करिए। आपने प्रतिज्ञा ली है, उसे मत तोड़िए। और कृष्ण कहते हैं नहीं, प्रतिज्ञा तो ठीक है। मतलब उन्होंने अपने action से दिखाया कि प्रतिज्ञा तो एक बात है परंतु अपने लोग भी तो मर रहे हैं। उनको बचाना अभी तो कर्तव्य है और अगर तुम नहीं करोगे तो कैसे होगा? तो इसलिए वो उस समय of course वो उपयोग उन्होंने नहीं किया है। तो it is not technically breaking but अगर अर्जुन नहीं मानता तो वो करते but I am sure he knew कि अर्जुन मानेगा ही मानेगा eventually। तो उसके बाद फिर अर्जुन लड़ता है। But भीष्म पितामह को भी मारना इतना सुलभ तो था नहीं। फिर उस रात क्योंकि युधिष्ठिर ने पहले दिन युद्ध शुरू होने के पहले जब वो, वो प्रणाम करने के लिए भीष्म, द्रोणाचार्य इन सबके पास जाते हैं। मतलब युद्ध के सामने-सामने सेना खड़ी है और अपने सारे शस्त्र उतार के युधिष्ठिर उतर जाते हैं और चलने लगते हैं। सब लोग सोच रहे हैं क्या करने गए हैं। फिर उन्हें पता चलता है कि नहीं वो जो अपने बड़े हैं, उनसे आज्ञा मांगने गए हैं युद्ध की। तो वो भीष्म के पास जाते हैं सबसे पहले और प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि आप मुझे आज्ञा दीजिए युद्ध लड़ने की। तो भीष्म हंसते हैं और कहते हैं कि अगर तुम नहीं आते ना क्योंकि ये तो सदाचार है। अगर तुम ये नहीं करते तो मैं तुम्हें विजयी भवा कभी नहीं कहता। पर अब तुम जब आए हो तो मैं तुम्हें विजयी होने का आशीर्वाद देता हूं और मैं तुम्हें वरदान देना चाहता हूं। जो मांगना है मांगो except तुम्हारी ओर से लड़ने मत कहना। मैं तुम्हारी ओर से लड़ नहीं सकता। क्यों? क्योंकि अर्थस्य मनुष्यः दासः जिसका नमक खाया हो ना, जहां से तुम्हें पैसे मिलते हो, वहां का तुम नमकहरामी नहीं कर सकते। इसलिए युद्ध तो मैं तुम्हारे side नहीं करूंगा पर और कुछ वरदान मांगो। तो युधिष्ठिर, ये युधिष्ठिर की बुद्धि है। वो कहते हैं कि पितामह आपको मारना हमारे लिए असंभव है। आप ही बताइए आपको कैसे मारा जाए? और भीष्म कहते हैं अभी सही नहीं है समय तुम फिर आना। जब सही समय होगा तब मैं तुमको बताऊंगा। तो यह उनका पहले दिन पर ही संवाद हुआ होता है। तो फिर उस नौवें दिन जब यह कृष्ण और अर्जुन का यह जो प्रसंग हुआ है, फिर उस रात इनको भी लगता है, युधिष्ठिर को भी लग रहा है। वो परिस्थिति ऐसी है कि इस तरफ दुर्योधन भी चाहता है कि भीष्म हटे क्योंकि भीष्म पांडवों को नहीं मार रहे हैं ना। इस तरफ से युधिष्ठिर को भी ऐसा है कि भाई वो हटे क्योंकि उसकी सेना मारी जा रही है, मारी जा रही है। अब जब तक भीष्म नहीं हटेंगे तब तक कर्ण हठ लेकर बैठा था कि मैं नहीं लड़ूंगा। है ना? तो दोनों side चाह रहे थे कि वो चले जाए somehow पर कोई निकाल पाए ऐसा तो था नहीं। तो फिर नौवें दिन रात को फिर वापस जाते हैं युधिष्ठिर और पूछते हैं। तब वो कहते हैं कि या तो जो पहले स्त्री रहके फिर पुरुष हुआ हो और जिसके ध्वजा पर अमंगल सूचक, ध्वज पर जो indication हो उसके साथ मैं नहीं लड़ूंगा। अब again संजय जी हम जो TV में देखते हैं ना कि अरे यह तो गलत हो गया क्योंकि शिखंडी जो है वो अर्जुन के साथ रथ पर खड़ा था और उसे देखकर भीष्म पितामह ने कोई लड़ा वड़ा नहीं और अपने सारे शस्त्र त्याग दिए। ऐसा नहीं है वो युद्ध ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। जब पांडवों को यह बात पता चलती है कि ऐसे किसी मनुष्य के सामने नहीं लड़ेंगे तो फिर उनको लगता है ऐसा तो शिखंडी है। तो वो शिखंडी क्योंकि शिखंडी भी महारथी है। तो वो शिखंडी को कहते हैं कि कल ना तुम उनको challenge करना, तुम उनके साथ लड़ना। तो शिखंडी अपने रथ पर है, अपने शस्त्रों के साथ है और वो भीष्म से लड़ाई कर रहा है। पर भीष्म उसको भाव ही नहीं देते। उसे घास ही नहीं डालते बिल्कुल और बाकी सब से युद्ध करते रहते हैं। शस्त्र छोड़े बूड़े नहीं उन्होंने। वो बाकी सब से युद्ध कर रहे हैं। केवल शिखंडी को कुछ नहीं कर रहे और शिखंडी के बाणों में इतना force नहीं है कि वो भीष्म को कुछ कर पाए। आधा दिन चला गया है। शिखंडी कुछ नहीं कर पा रहा है। पांडव उसे प्रेरित करने का प्रयत्न कर रहे हैं कि करो करो हम तुम्हारे साथ हैं but वहां भाव ही नहीं दे रहे ना। सामने उनका उसका सामना ही नहीं करने को तैयार है भीष्म। फिर अर्जुन युद्ध करने आता है और वो उन पर attack शुरू कर देता है। उस समय फिर उसे रोकने के लिए दुःशासन वो सब आते हैं अर्जुन को attention ले जाने के लिए और अर्जुन उन सबको वापस पीछे धकेल देता है और फिर भीष्म पितामह से युद्ध करने लगता है। इतना शायद हुआ होगा कि शिखंडी कहीं तो बीच में आ रहा है और भीष्म हैं, वो उस तरफ से लड़ तो रहे हैं पर शिखंडी थोड़ा बहुत शायद बीच में आ रहा होगा। पर भीष्म पितामह ने लड़ना नहीं छोड़ा। वो अर्जुन के साथ भी लड़ ही रहे थे। बाकी सबके साथ भी लड़ ही रहे थे। फिर eventually अर्जुन के बाण जब उनको बहुत ज्यादा लग गए तब जाके उनके हाथ से शस्त्र छूटा है। उन्होंने स्वयं से शस्त्र नीचे रख दिया। ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ है। सिर्फ उन्होंने शिखंडी को घास ही नहीं डाला। उसके साथ वो लड़े ही नहीं। यह प्रसंग है उसमें जो महाभारत में आता है।
34:56
युधिष्ठिर के और अर्जुन के बीच में भी बोलचाल हो जाती है चक्रव्यूह के बाद।
35:00
तब तो वो बहुत दुखी है। वो कहता है कि अरे आप लोगों ने मेरे बच्चे को भेज दिया। आप जानते थे उसे वापस आना नहीं आता। तब फिर भी आपने कह दिया मैंने तो आपकी रक्षा में उसे छोड़ा था और आपने उसका ध्यान नहीं रखा। पर वो समझाते हैं युधिष्ठिर से कि भाई ऐसा हुआ कि जयद्रथ के कारण हम जा नहीं पाए। हम तो उसके पीछे-पीछे ही थे। But जयद्रथ को वो वरदान था कि जब तुम नहीं रहोगे तभी एक दिन वो हम सब पर हावी हो जाएगा। और आज वो दिन था। इसीलिए फिर अर्जुन को गुस्सा होता है और बोल देता है कि मैं कल जयद्रथ को या तो मार दूंगा सूर्यास्त से पहले या स्वयं को जला दूंगा। है ना? अब यह बात सुनके कौरव अति प्रसन्न हो जाते हैं और कृष्ण बहुत ही गुस्सा हो जाते हैं। वो अर्जुन को झापते हैं। वो कहते हैं कैसा बेवकूफ है, तुझ पे लोग हँसेंगे नहीं तो क्या करेंगे? Literally वो ये कह रहा है कि तुझ पे लोग हँसेंगे नहीं तो क्या करेंगे? कोई ऐसा बेवकूफ होता है क्या जो strategy बता देता है? अब उनको क्या काम करना है कौरवों को? केवल इतना ही ध्यान रखना है कि जयद्रथ की मृत्यु ना हो। केवल जयद्रथ को बचाना है। उसके अलावा उन्हें कुछ नहीं करना है। केवल जयद्रथ को बचा ले कि वो युद्ध जीत गए because तुम स्वयं ही मर जाओगे। तो यह ऐसी बेवकूफी कौन करता है? पर अब ठीक है, हो गया तो हो गया। अब क्या करोगे, है ना? तो दूसरे दिन इन्होंने तो बहुत ही विस्तृत व्यूह बनाया है। ऐसे व्यू के अंदर, व्यू के अंदर चक्रशकट व्यू, फिर उसके अंदर कमल पद्म व्यू, फिर उसके अंदर सूचि व्यू और उस समय से तीन levels of व्यूह बनाए हैं। वो army formations fortress is literally और उसमें अंत में जयद्रथ है। वो सभी को लांगते हुए अर्जुन जयद्रथ को मारता है। उस रात ना दुर्योधन को सबसे ज्यादा धक्का लगा है। Finally उसे realize होता है कि अर्जुन में सही में कुछ quality है और वो कहता है कि यार ये तो द्रोण, द्रोणाचार्य यहां थे, कर्ण था और तुम कोई भी जयद्रथ को नहीं बचा पाए। जो लोग कहते हैं वो सही है कि अर्जुन शायद हम सब से बहुत अधिक है। फिर यह बंदा कूद पड़ता है कि अरे नहीं नहीं ये तो शायद नसीब के कारण है, तुम चिंता मत करो, मैं हूं ना वगैरह कर्ण करता है और द्रोणाचार्य जो है उनको भी बहुत बुरा लगता है। तो उस दिन 15th day morning पे वो पूरे जोश में है। पूरे के पूरे जोश में। ऐसे तबाह किए जा रहे हैं वो पांडवों की सेना को। उसी दिन पे विराट का वध वो करते हैं। उसी दिन पे द्रुपद का वो वध करते हैं। कितने सारे राजा महाराजाओं का वध वो उस दिन करते हैं। ऐसे full form में है वो। तब ये लोग बात करते हैं कि यार इस प्रकार अगर द्रोणाचार्य युद्ध करते रहे तब तो आधे दिन में युद्ध समाप्त हो जाएगा और हम बच भी गए क्योंकि द्रोणाचार्य भी पांडवों को नहीं मारने वाले थे। तो पांडव बच भी गए तो कोई और बचेगा नहीं तो क्या? खत्म ना युद्ध तो। तो कृष्ण कहते हैं कि ऐसे तो नहीं होगा। अभी तो कुछ हमें सोचना पड़ेगा। कैसे हम उनको weak कर सकते हैं। एक ही तरीका है। उनका सबसे ज्यादा प्रिय अश्वत्थामा है। अगर अश्वत्थामा को कुछ हुआ तो। कृष्ण कुछ और आगे कहे ना उसके पहले भीम को समझ आ जाती है बात। तो वो अपना गदा घुमाता है और अपने ही और का एक हाथी है अश्वत्थामा, उस पे जोर से गदा फेंक के उसको मार डालता है, अपने ही side का। और फिर वही जोर-जोर से चिल्लाने लगता है कि अरे अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई, अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई, अरे अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई। द्रोणाचार्य वो बात सुनते हैं और उनको दुख होता है। वो कहते हैं ऐसा तो नहीं हो सकता, मेरे बेटा कोई ऐसा मर जाए, ऐसा तो possible नहीं है। तो फिर उनको लगता है मुझे युधिष्ठिर सही बात बताएगा। तो वो युधिष्ठिर को पूछते हैं और वही बात जो है कि युधिष्ठिर कहते हैं हां अश्वत्थामा हा तो और आगे जा के बोलता है, बोलता है नरोवा कुंजरोवा। परंतु यह सुनकर द्रोणाचार्य अपने शस्त्र नहीं त्यागते। थोड़े से शिथिल होते हैं पर वो फिर भी युद्ध करते हैं और थोड़ी देर में फिर से form में आके फिर से वो युद्ध करते हैं। नरोवा कुंजरोवा वाले प्रसंग का या अश्वत्थामा हा तो का उन पे कोई दुख हुआ है उनको पर उन्होंने युद्ध करना नहीं छोड़ा। फिर एक समय उनके मन में विचार आता है कि मैं ब्रह्मास्त्र use कर दूंगा। तो वो ब्रह्मास्त्र use करने ही वाले होते हैं। तो गीता प्रेस में ऐसा दिखाया है कि उनको देव -- जो और ऋषि थे उन्होंने उन्हें कहा, उनके मन में basically उन्हें inspiration आया कि अरे तुम क्या कर रहे हो? वैसे ही तुमने इतना विनाश किया है, अब मत करो, बहुत हो गया। अब और एक ब्रह्मास्त्र का उपयोग करके अपने सर पे कलंक मत लगाओ। इसलिए वो ब्रह्मास्त्र त्याग देते हैं। पर वो मन में ना कि अब खत्म हो गया। ये उनके मन में आना शुरू हो गया है। तब वापस भीम उनके पास जाता है और भीम वापस उनको बोलता है कि अरे आप क्या कर रहे हो? आपका बेटा -- आपने ये सब क्यों किया अपने बेटे के लिए? आपका बेटा मर गया है। फिर भी आप लड़, लड़, लड़ रहे हो। किसके लिए लड़ रहे हो आप? ये वापस भीम जा के बोलता है। जब ये हुआ है और वो ऋषियों की जो उनको जो inspiration आया है, उस समय जाकर उन्होंने अपने शस्त्र त्यागे हैं और शस्त्र त्यागने के बाद वो अ-योगावस्था में -- तो बताया ऐसे कि वो योगावस्था में बैठे हैं और प्राणायाम कर रहे हैं। तो ऐसा भी कहा जाता है कि वो प्राणायाम करते-करते उन्होंने almost अपना देह त्याग -- मतलब अपना जो उनकी आत्मा थी वो निकल ही गई थी। पर उनको बैठा हुआ देखकर धृष्टद्युम्न कूद पड़ता है और उनका सिरच्छेद कर देता है। अब उस समय वो जीवित थे या नहीं थे, ये भी प्रश्न चिन्ह है। पर हां, वो जब बैठे हैं तब धृष्टद्युम्न उनको मार देता है। पर जब धृष्टद्युम्न मान-मारता है तो सबसे ज्यादा क्रोधित कौन होता है, आप जानते हैं? अर्जुन। कि तुमने ये गलत किया। तुम ये कैसे कर सकते हो? और फिर वो सात्यकि कहता है, अरे इसमें क्या हुआ? ये तो करना ही था वगैरह। तो उनके बीच उस समय और वाद विवाद थोड़ा सा हो जाता है कि कुछ, कुछ लोग धृष्टद्युम्न को सही कहते हैं। नहीं सात्यकि भी उसका विरोध करता है शायद तब कि भई क्या कर दिया ये? And फिर वापस वो शांत हो जाता है। पर वो एक प्रसंग में वापस वो धृष्टद्युम्न पे गुस्सा, गुस्सा हो गए। पर ये इस प्रकार वो हुआ है। केवल युधिष्ठिर के कहने से त्याग दिया है, ऐसा नहीं है। इसमें actually भीम का role है और भीम को हम credit नहीं देते। [हँसने की आवाज़]
23:33
यह रामचरितमानस में।
23:34
यह रामचरितमानस में और यह popular retellings में यही अधिकतर आता है। वाल्मीकि रामायण में यह प्रसंग एकदम भिन्न है। एकदम मतलब एकदम भिन्न है। वाल्मीकि रामायण में अहल्या अत्यंत सुंदर है। गौतम ऋषि की पत्नी है, यह बात तो वैसी ही है और इंद्र जो है वह बहुत ही आकर्षित है अहल्या पर। तो एक बार जब गौतम ऋषि नहीं है तब ऋषि वेश में गौतम ऋषि वेश में भी नहीं। ऋषि वेश में वह आता है और कहता है कि तुम्हारे साथ मुझे संगम चाहिए। अहल्या को यह बात पता है। अहल्या जी जानती हैं यह बात कि यह इंद्र है, क्योंकि जो श्लोक है वह ऐसे आता है। सहस्राक्षं विघ्नाय अविघ्नाय नहीं विघ्नाय मतलब जानकर। सहस्राक्षं विघ्नाय। मति चकार दुर्मेधे देवराज कुतुहलात् कि जब उनको पता था कि यह देवराज है पर इतना बड़ा राजाओं का राजा वह मुझे चाह रहा है। right यह सोचकर उनका मतिभ्रम हो गया। Again one of those very natural instincts जो कहते हैं ना आज भी जो लोगों के साथ हो जाता है कि अरे वह अरे वह इतना महान है, वह इतनी सुंदर है, वह मुझ पर मुझे चाहती है। वह भाव आ गया और वह एक lapse of judgement उनसे उस समय हो गया और उन्होंने जानकर कि इंद्र है accept किया। वह प्रस्ताव जो इंद्र का था, वह accept किया। फिर वह कहती हैं संतुष्टास्मि अब मैं संतुष्ट हूं। शीघ्रं गच्छ। अब तुम यहां से जाओ। रक्षस्व त्वां मामपि गौतमात् अपने आप को और मुझको गौतम से बचाओ। रक्षा करो। इसलिए तुम यहां से जल्दी जाओ। पर इंद्र जाए उसके पहले ही गौतम ऋषि आ जाते हैं। उनको पता चल जाता है क्या है। अब again लोग कहते हैं कि देखो अपनी पत्नी जिसने कुछ भी नहीं किया था उसे तो दंड दे दिया और इंद्र जो actual offender था उसे कुछ नहीं किया। पर वाल्मीकि रामायण में यह भी नहीं है। सबसे पहले गौतम ऋषि इंद्र को श्राप देते हैं। वह कहते हैं तुमने ललचाया है, तुमने यह करा है इसीलिए तुम्हें मैं विफलं भव: नपुंसक बन जाओ। यह तुमको मैं श्राप देता हूं। तो उसको श्राप दे देते हैं। और यहां अहल्या को कहते हैं कि तुम क्या करो। यहां रहकर तुम तपस्या करो। तुम यहां रहकर प्रायश्चित करो। कैसे निराहारा वातभक्षा। बिना कुछ खाए वातभक्षा। इसी कुटिया में तुम रहोगी और जैसे समाज से अदृश्य सी हो जाओगी। In the sense तुम अकेले रहकर यहां करो। तुम तपस्या करो यहां रहकर। और फिर कभी तो राम आएंगे। जब राम आएंगे उस समय तुम्हारा यह खत्म हो जाएगा। अच्छा अब जब श्रीराम आते हैं तो श्रीराम, लक्ष्मण और विश्वामित्र जी यह तीनों साथ हैं और वह जब कुटिया देखते हैं निर्जन सा है but सुंदर सा वह बगीचा है तो पूछते हैं कि कौन है यहां पर। तो विश्वामित्र जी कहते हैं, यहां पर देव रूपिणी तेजस्विनी अहल्या रहती हैं। और फिर तब विश्वामित्र जी यह पूरी कहानी बताते हैं और वह कहते हैं अंदर आओ। फिर जब वह अंदर जाते हैं तो वहां जो description है कि अहल्या देवी जो है वह अपने ही आभा में प्रज्वला, प्रज्वलित हो रही थी अपनी ही आभा में। और राम और लक्ष्मण हम हमने देखा है कि पत्थर को पांव लगाते हैं। पत्थर तो है ही नहीं पर राम और लक्ष्मण जाकर तस्याः पादौ जग्रहतु। वो दोनों जाकर अहल्या मां के पैर छूते हैं और फिर वो उनका आदर सत्कार करती है। तो इस प्रकार यह बात आती है। फिर ये लोग जब जनक जी के पास गए हैं ना मिथिला में तो जनक जी के जो पुरोहित है वो है शतानंद। शतानंद, अहल्या मां और गौतम ऋषि के सबसे बड़े पुत्र हैं। तो उनको जब कहा जाता है कि हम आपकी मां से मिलकर आ रहे हैं तो वो इतने खुश हो जाते हैं। वो कहते हैं मेरी यशस्वी माता से आप मिलकर आए हो। अब इस प्रसंग को देखकर generally कोई कोई लोग होते हैं जिनको बुरा लगता है कि अरेरे उन्होंने ऐसे कैसे कर दिया। उन्होंने गलत कर दिया। कुछ कुछ लोगों को लगता है कि नहीं ठीक है अब at least this story makes sense। परंतु हम क्या सीख रहे हैं story से? और इसमें विश्वामित्र जी यह कथा बता रहे हैं। यह और भी ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है क्योंकि ऐसा कई बार होता है कि हमसे गलती हो सकती है जीवन में है ना। पर उसका अर्थ यह नहीं है कि सब खत्म ही हो गया। अगर आप उसे acknowledge कर कर उस पर प्रायश्चित करोगे। अच्छा वो क्यों हुआ? उनके साथ जो हुआ, वो जो मतिचकार जो उनका हो रहा है वो क्यों हुआ? क्योंकि उस समय एकदम काम और ego की अरे मुझे वो चाहता है वो उनके सर पर हावी हो गया। है ना? तो जो कृष्ण कहते हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर उसी का खेल है यह। फिर जब हम तपस्या की बात करते हैं या प्रायश्चित की बात करते हैं तो क्या है? वह effort है कि उन वृत्तियों को हम हमारे काबू में करते जाएं। जैसे इंद्रिय निग्रह कहते हैं। तो अगर वो आप कर पाए तो वही प्रायश्चित है and you get a chance again जैसे अहल्या मां को मिला। अब जैसे मैं कह रही थी विश्वामित्र यह बात कह रहे हैं। यह क्यों महत्वपूर्ण हो जाती है? क्योंकि विश्वामित्र आप तो जानते हैं कोई विश्वामित्र पहले से तो नहीं थे। वो तो राजा कौशिक थे। राजा कौशिक वशिष्ठ जी से अपनी शत्रुता में उन्होंने सोच लिया कि मुझे वशिष्ठ जी जैसी शक्ति चाहिए। वह है ब्रह्मबल और तपस्या में लग जाते हैं। और जब वह तपस्या में लग गए तो पहले तो jealousy के कारण उनकी तपस्या उनको वापस शुरू करनी पड़ती है। जो भी उनकी सिद्धियां हैं वो खत्म हो जाती है। फिर एक बार क्या होता है कि मेनका पर वो मोहित हो जाते हैं। 10 साल साथ रहते हैं। फिर उनको याद आता है अरे मेरी तो तपस्या चल रही थी। मेरा, मेरा मेरे काम पर, lust पर तो control हुआ ही नहीं। इसलिए वो मेनका को कहते हैं चले जाओ। फिर वापस तपस्या में लग जाते हैं। फिर इंद्र को ऐसा है कि test करो। इसलिए वो रंभा को भेजते हैं। तो रंभा को जब देखते हैं विश्वामित्र जी तो इस बार lust पर control हो गया है पर बहुत गुस्सा हो जाते हैं। उनको समझ आ जाता है यह जानबूझकर खेल कर रहा है इंद्र मेरे साथ। इसलिए वो रंभा पर चिल्ला देते हैं और उनको तुरंत strike होता है कि अरे काम पर तो control कर लिया क्रोध पर नहीं किया। वापस तपस्या शुरू करते हैं और eventually जाकर जब इन सारी वृत्तियों पर control हासिल हुआ है तब वो विश्वामित्र बने हैं। तो अगर विश्वामित्र से इतनी बार गलतियां हो सकती है तो अहल्या मां से हो गई। पर बात केवल mistake करके।

11 MINS LATER

40:53
वानर रूप में।
40:54
नहीं। Even किष्किंधा का जो वर्णन आता है वो proper city जैसा वर्णन है। उनकी जो भाषा है वो भी मनुष्य जैसी भाषा है। In fact जब पहली बार, एकदम पहली बार किष्किंधा में जब हनुमान जी और श्रीराम लक्ष्मण की भेंट होती है ना वही बहुत जबरदस्त है। कई बार यह कहते हैं कि अरे हनुमान जी तो, को तो पहले से पता था। वो तो बस रुके बैठे थे कि कब श्रीराम आ रहे हैं। ऐसा कुछ नहीं है। वाल्मीकि रामायण में ऐसा कुछ नहीं है। हनुमान जी सुग्रीव के मंत्री हैं। जो बाकी चार मंत्री हैं उनमें से एक है और सुग्रीव वाली से बचने के लिए ऋष्यमुख पर्वत पर रह रहा है। तो जब राम और लक्ष्मण ढूंढते आ रहे हैं कि भाई उनको सुग्रीव से मिलना है क्योंकि कबंध ने बताया होता है कि वो तुम, तुम्हारी सहायता कर सकते हैं। उनको भूगोल की बहुत अच्छी जानकारी है। तो उनको दूर से देखकर सुग्रीव बहुत डर जाता है। उसे लगता है ऐसे हट्टे कट्टे नवयुवकों को पक्के से वाली ने भेजा है मुझे मारने के लिए। इसलिए वो बहुत anxious हो जाता है। यहां से वहां jump मारने लगता है। तो हनुमान जी, तब हनुमान जी का पहला line आता है और वो कहते हैं कि अरे आप राजा हैं, आपको इस प्रकार anxious नहीं हो जाना चाहिए। आप पहले पता तो करिए कौन हैं ये लोग। वाली ने अभी तक आपको कभी ऋष्यमुख पर्वत पर परेशान नहीं किया। आप जानते हो उसको श्राप लगा हुआ है, यहां तो वो नहीं आएगा। तो ये लोग भी उसने भेजा ऐसा तो नहीं है। तो पता तो करते हैं। तो सुग्रीव कहता है बहुत अच्छी बात है तुम जाके पता करो और तुम पता भी करना, उनके हाव-भाव भी देखना वो क्या कह रहे हैं और दे देखना कि वो हमारे मित्र बन सकते हैं कि नहीं। इसलिए हनुमान जी साधु वेश लेकर-- अच्छा अब monkey, monkey होते तो साधु वेश कैसे लेते, है ना? साधु वेश मतलब वो कपड़े change करे हैं उन्होंने और वो गए हैं इनके पास और अम्म- जो पूरा उनका संवाद है। वो कहते हैं कि अरे आप दोनों कौन हैं? आप तो आपकी तो प्रभा यहां सबको आपकी सभा की आपकी प्रभा के सामने तो कोई भी यहां दिख नहीं पा रहा है। आप लोग हैं कौन? आप कोई देव रूपी आप कहीं देवलोक से आए हो या क्या हो? आपको देखकर तो लगता है कि आपको तो कहीं महलों में रहना चाहिए। आप ये तपस्वी वेश में यहां क्यों घूम रहे हो? ऐसे कर कर के बहुत ही प्रशंसा करते हैं। उनको ऐसा है कि generally अगर किसी की आप प्रशंसा करो तो सामने वाले बोलना लगता है ना। पर ये तो श्री राम और लक्ष्मण है। वो सुने जा रहे हैं, सुने जा रहे हैं। कुछ एक शब्द बोल नहीं रहे हैं मुंह से। फिर हनुमान जी कहते हैं कि अरे मैं आपसे इतना कुछ कह रहा हूं, आप कुछ कह नहीं रहे। फिर भी ये लोग कुछ नहीं कहते हैं। फिर हनुमान जी को लगता है कि यार इनसे सीधा बात करना पड़ेगा। इनको मैं ऐसे diplomatically नहीं फंसा सकता तो इनके साथ तो सीधा बात करना पड़ेगा। तो वो कहते हैं कि मैं हनुमान हूं, मैं सुग्रीव का मंत्री हूं और वो आपसे मित्रता चाहते हैं। इसीलिए मैं आपके पास आया हूं। वो सीधा ये बात कहते हैं। तो जब ये बात होती है फिर श्री राम लक्ष्मण से अकेले में उनका observation कहते हैं हनुमान जी के बारे में और वो लक्ष्मण से कहते हैं लक्ष्मण तुमने इनकी वाणी देखी, इनकी वाणी कैसी है? कोई जिसे ऋग्वेद ना आता हो, यजुर्वेद ना आता हो और सामवेद ना आता हो उसकी वाणी ऐसी हो ही नहीं सकती। इनका व्याकरण तो देखो। अच्छा व्याकरण वगैरह की बात करें मतलब वो संस्कृत में बात कर रहे थे, है ना? इनका व्याकरण तो देखो एक भी गलती नहीं थी इनके व्याकरण में। इनके उच्चारण में एक भी गलती नहीं है। इन्होंने जो शब्दों का प्रयोग किया, ये कैसे थे कल्याणकारी। किसी का भी मन मोह ले ऐसे शब्दों का इन्होंने प्रयोग किया। वो कहते हैं ये सुग्रीव जिनके कह रहे हैं कि मंत्री है वो तो बहुत उनका कोई काम ना हो ऐसा तो होता ही नहीं होगा। क्यों? क्योंकि यस्य गुणा गुणैः युक्तः इनके जैसे गुण है वैसे गुणों से युक्त जो हो तस्य सिद्ध्यन्ति सर्वार्थ उसके सारे काम हो जाएंगे। जिनके ऐसे दूत हो उनके सारे काम हो जाएंगे। तो यह observation श्री राम का हनुमान जी के बारे में। अब monkey ऐसे कैसे बात करेंगे? monkey को वेदों की पढ़ाई कहां से होगी? है ना? तो clearly ये लोग ही थे जो स्वयं रामायण में आता है। वाल्मीकि रामायण में वानरः वनचारिणः ऐसा शब्द प्रयोग है जो आया है तो वो लोग ही हैं। पर और यह यह प्रसंग जो है यह इस प्रकार आता है कि कैसे वो मिले और आपने जो कहा कि हनुमान जी का जो विस्तृत वर्णन जो रामायण में आता है वह सबसे ज्यादा अधिक कहां पर आता है? सुंदरकांड में। क्योंकि सुंदरकांड तो उन्हीं पर है। तो मानस में भी ऐसा ही है।

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